ZFunds

Portfolio Meaning in Hindi : पोर्टफोलियो का मतलब क्या है, परिभाषा, प्रकार, घटक और मैनेजमेंट

Updated on November 21, 2024

image

Written by Manish Kothari

CEO Zfunds

share

Share

Portfolio Meaning in Hindi

Kya aapka Mutual Fund Sahi hai? Janiye Experts se

By clicking on button you agree with Privacy Policy and Terms of use

image

Get Updates on WhatsApp and SMS

Save Rs. 100 with Daily SIP

Portfolio Meaning in Hindi : पोर्टफोलियो का अर्थ क्या है ? 

एक पोर्टफोलियो ईटीएफ (एक्सचेंज-ट्रेडेड फंड) और क्लोज-एंड फंड समेत स्टॉक, कमोडिटीज, बॉन्ड, कैश और कैश इक्विवेलेंट्स जैसे निवेशों का एक समूह होता है। लोगों का मानना है कि एक पोर्टफोलियो में केवल स्टॉक, बॉन्ड और कैश ही शामिल होते हैं। लेकिन हर फंड के साथ में ऐसा हो संभव नहीं है, क्योंकि यह कोई नियम नहीं है। एक निवेशक के पोर्टफोलियो में इक्विटी निवेश, रियल एस्टेट, और कला, आदि समेत संपत्ति की एक विस्तृत श्रृंखला शामिल हो सकती है। 

व्यक्ति अपने पोर्टफोलियो को अपनी व्यक्तिगत क्षमता के आधार पर प्रबंधित करने का विकल्प चुन सकते हैं, या वे वित्तीय सलाहकार, मनी मैनेजर या किसी अन्य पेशेवर को अपने पोर्टफोलियो को प्रबंधित करने की अनुमति दे सकते हैं। 

पोर्टफोलियो के अवयव (Component of Portfolio)

1.) स्टॉक (Stock):

इक्विटी स्टॉक पोर्टफोलियो का एक सबसे सामान्य कंपोनेंट है। ये सिक्योरिटी आय का एक स्रोत साबित हो सकता हैं क्योंकि जैसे-जैसे कंपनियां प्रॉफिट कमाती हैं, वह इसका एक हिस्सा अपने ग्राहकों को डिविडेंट के रुप में दे देती है। इसके अलावा, इन होल्डिंग्स को कंपनी के संचालन और प्रदर्शन के आधार पर अधिक कीमत पर बेचा जा सकता है। स्टॉक्स में कंपनी बिजनेस और मार्केट पोटेंशियल के आधार पर हाई रिटर्न्स डिलीवर करने की क्षमता होती है। 

2.) बॉन्ड (Bond):

जब व्यक्ति बॉन्ड में निवेश करते हैं, तो वे बॉन्ड जारीकर्ता को पैसा उधार दे रहे होते हैं, जारीकर्ता में कंपनी, सरकार या एजेंसी शामिल हो सकते हैं। प्रत्येक बॉन्ड एक निश्चित टाइम पीरियड और मैच्योरिटी के साथ आता है, जो ये दर्शाता है कि बॉन्ड खरीदने के लिए उपयोग किए जाने वाले प्रिंसिपल अमाउंट को बाद में ब्याज समेत लौटाया जाना है। 

इक्विटी की तुलना में, बॉन्ड कम रिटर्न्स डिलीवर करते हैं क्योंकि बॉन्ड में स्टॉक्स की तुलना में जोखिम कम होता है।

3.) वैकल्पिक निवेश विकल्प:

अन्य वैकल्पिक निवेशों में इक्विटी, बॉन्ड और डेट सिक्योरिटीज जैसी पारंपरिक सिक्योरिटीज के अलावा अन्य संपत्ति या निवेश शामिल हो सकते हैं। इन निवेशों के कुछ उदाहरण हेज फंड, इक्विटी, कमोडिटीज आदि हो सकते हैं। 

ये विकल्प आमतौर पर पारंपरिक निवेश जैसे शेयर्स और बॉन्ड्स की तुलना में धीमी गति से कारोबार करते हैं।

ज्यादा जानकारी के लिए पोर्टफोलियो का वीडियो देखे

thumbnailyoutube-logo

पोर्टफोलियो मैनेजमेंट (Portfolio Manager)

निवेशक अपने पोर्टफोलियो को एक पिज्जा की तरह मान सकते हैं जिसे अलग-अलग आकार के टुकड़ों में काटकर बांटा जाना है, प्रत्येक भाग एक अलग प्रकार के निवेश प्रकार को दर्शाता है। किसी भाग को रिस्क-रिवार्ड पोर्टफोलियो आवंटन के लिए चुना जा सकता है, जो टारगेट्स और रिस्क के लिहाज से सही हों। फिलहाल, शेयर्स, बॉन्ड्स और कैश को पोर्टफोलियो के लिए आधार स्तम्भ माना जाता है। निवेशक विभिन्न प्रकार के अन्य विकल्पों के साथ एक पोर्टफोलियो ग्रो कर सकता है जिसमें गोल्ड, स्टॉक, रियल एस्टेट, कमोडिटीज शामिल हो सकते हैं।

Also Read: How to become mutual fund advisor

पोर्टफ़ोलियो (Portfolio) का उद्देश्य

पोर्टफोलियो मैनेजमेंट के सबसे महत्वपूर्ण पहलुओं में से एक है डायवर्सिफिकेशन। जिसका स्पष्ट अर्थ है कि जोखिम को कम करने के लिए किसी एक ही जगह पर सारा पैसा इंवेस्ट ना करना। कई ऐसेट क्लासेस में पोर्टफोलियो को डायवर्सिफाय करके इंवेस्टर्स के जोखिम को कम करना इसका मुख्य उद्देश्य होता है। साथ ही इंवेस्टर्स को  मार्केट से अधिक से अधिक रिटर्न्स निकाकर देना पोर्टफोलियो का मेन टारगेट होता है। इसे मार्केट कंडीशन्स के हिसाब से बदला जा सकता है। 

पोर्टफोलियो (Portfolio) बनाने के लिए कदम

लक्ष्य निर्धारित करें-

निवेशकों को सबसे पहले देखना चाहिए कि उनका पोर्टफोलियो उनके गोल्स से मेल खाता है या नहीं। ऐसा करने से उन्हें अपने टारगेट को अचीव करने में आसानी होगी।

पोर्टफोलियो में कम से कम बदलाव करें: 

कुछ निवेशक बहुत कम समय के भीतर सिक्योरिटीज को खरीदना बेचना पसंद करते हैं। ऐसे निवेशकों को यह ध्यान रखना होगा कि इससे लेनदेन लागत बढ़ जाती है। साथ ही कुछ विशेष प्रकार के निवेश के भुगतान में समय भी लगता है।

एसेट्स पर बहुत अधिक खर्च न करना:

किसी एसेट को प्राप्त करने के लिए लागत जितनी अधिक होगी, लाभ के मौके उतने ही कम होंगे।वहीं किसी ऐसेट की कीमत जितनी कम होगी, संभावित लाभ उतना ही अधिक होगा। ये वैसा ही है जैसे हम कम दाम पर स्टॉक्स खरीदते हैं और अधिक होने पर बेच देते हैं। 

एक ही निवेश पर निर्भर ना रहना:

जैसा कि अक्सर कहा जाता है, "अपना सारा पैसा एक जेब में मत रखो”। एक लाभदायक पोर्टफोलियो बनाने की कुंजी विविधीकरण यानी डायवर्सिफिकेशन है। जब हमारा कोई एक निवेश एक मंदी की स्टेज में होता हैं, तो दूसरे में तेजी की संभावना बनी रहती है। निवेश के ज्यादा विकल्प होने से किसी निवेशक के लिए अपने संपूर्ण रिस्क को कम करने में मदद मिलती है।

पोर्टफोलियो के प्रकार ( Type of Portfolio) :

निवेश या तो रणनीतिक हो सकता है, जहां एक निवेशक लंबी अवधि के लिए उन एसेट्स पर कब्जा करने के इरादे से इक्विटी खरीदता है। या फिर सामरिक हो सकता है, जहां एक निवेशक सक्रिय रूप से अल्पावधि में लाभ प्राप्त करने की उम्मीद में सिक्योरिटीज खरीद-बेच सकता है।

निवेशकों के लिए पोर्टफोलियो उनके रिस्क, गोल्स और अन्य जरुरतों के आधार पर अलग-अलग होंगे। कुछ सामान्य मॉडल विभागों की चर्चा नीचे की गई है :-

1.) आक्रामक, इक्विटी-केंद्रित पोर्टफोलियो:

इस निवेश में शामिल एसेट्स आम तौर पर हाई रिस्क को स्वीकार करते हैं, क्योंकि यह शानदार रिटर्न प्रदान करते हैं। आमतौर पर उच्च जोखिम क्षमता रखने वाले निवेशक कंपनियों की इक्विटीज में निवेश चाहते हैं। ऐसे निवेशकों के पास स्मॉल कैप फंड्स ज्यादा देखने को मिलेंगे, क्योंकि स्मॉल कैप फंड्स हाई रिटर्न्स देते हैं। 

2.) हाइब्रिड पोर्टफोलियो:

यह दृष्टिकोण एसेट क्लेसेस में डायवर्सिफिकेशन लाता है। इसके लिए बॉन्ड्स के साथ-साथ स्टॉक, रियल एस्टेट, कमोडिटीज और यहां तक ​​कि आर्ट्स में भी पोजीशन लेने की जरूरत होती है। एक हाइब्रिड पोर्टफोलियो अक्सर बॉन्ड, स्टॉक और वैकल्पिक निवेश के अनुपात को सही बनाता है। यह फायदेमंद है क्योंकि ऐतिहासिक रूप से, बॉन्ड, शेयर और वैकल्पिक विकल्पों ने एक दूसरे के बीच सही तालमेल के जरिये अच्छे रिटर्न्स दिए हैं। 

3.)कंजरवेटिव(परंपरावादी) पोर्टफोलियो :

इस प्रकार के पोर्टफोलियो में निवेशक इक्विटी और अन्य उच्च जोखिम वाले निवेशों में अपने पोर्टफोलियो को एक छोटा भाग निवेश करते हैं। इस तरह के पोर्टफोलियो में सुरक्षित विकल्पों जैसे डेट फंड्स में अधिक इंवेस्ट किया जाता है।  

4.) आय-केंद्रित पोर्टफोलियो :

इस प्रकार के पोर्टफोलियो में ज्यादा रिटर्न्स देने वाले शेयरों, फिक्सड इनकम देने वाली सिक्योरिटीज और अदर्स हाई रिटर्न्स देने वाली इंवेस्टमेंट्स से वेनिफिट होता है। इस तरह के पोर्टफोलियो निवेशकों के लिए रेगुलर और पॉजिटिव इनकम कमाने का टारगेट रखते हैं। इसका सबसे अच्छा उदाहरण है रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट यानी रीट्स।

5.) डिफेंसिव इक्विटी पोर्टफोलियो :

एक डिफेंसिव यानी रक्षात्मक पोर्टफोलियो कंज्यूमर स्टेपल के शेयरों में निवेश का लक्ष्य रखता है, जो मंदी से प्रभावित नहीं होते हैं। इस तरह के स्टॉक्स मंदी के साथ-साथ तेजी के दौर में भी अच्छा प्रदर्शन करते हैं। अर्थव्यवस्था चाहे कितनी भी बुरी क्यों न हो, जरुरत की चीजें के निर्माण में जुटी कंपनियों का अस्तित्व हमेशा बना रहता है।

रिस्क टॉलरेंस पोर्टफोलियो को कैसे प्रभावित करता है ?

एक फाइनेंशियल एक्सपर्ट या सलाहकार एक निवेशक के लिए एक सामान्य पोर्टफोलियो मॉडल बना सकता है। लेकिन निवेशक की जोखिम सहनशीलता(रिस्क टॉलरेंस) को पोर्टफोलियो के कंपोनेंट्स में मुख्य रूप से ध्यान में रखना चाहिए। इसके विपरीत एक उच्च जोखिम-सहनशीलता वाले निवेशक के पास स्मॉल-कैप कंपनियों के शेयरों या म्यूचुअल फंडों, लार्ज कैप ग्रोथ स्टॉक्स, कुछ हाईब्रिड बॉन्ड्स का जोखिम हो सकता है। इसके अलावा ऐसे निवेशक रियल एस्टेट और अन्य वैकल्पिक निवेश विकल्पों की तलाश भी कर सकता है।

वहीं एक परंपरागत निवेशक, इंडेक्स फंड, लार्ज-कैप, निवेश-ग्रेड बॉन्ड और उच्च-श्रेणी के लिक्विड इन्वेस्टमेंट विकल्पों में से किसी एक के साथ अपना एक पोर्टफोलियो बना सकते हैं। यानी निवेशक के जोखिम को कम कर सकते हैं। 

समय अवधि पोर्टफोलियो को कैसे प्रभावित करती है ?

जैसा कि हमने जोखिम सहनशीलता के बारे में बात की है, निवेशकों को एक पोर्टफोलियो का निर्माण करते समय निवेश करने की इच्छा यानी गोल्स को ध्यान में रखना चाहिए। सरल शब्दों में, निवेशकों को एक परंपरागत एसेट वितरण के साथ आगे बढ़ना चाहिए, क्योंकि उनकी टारगेट डेट नजदीक आती है, ताकि उस दिन तक उनके पोर्टफोलियो के रिटर्न को सेफ किया जा सके। इसके अलावा, किसी के पोर्टफोलियो में एसेट एलोकेशन की योजना समय अवधि के आधार पर बनाई जानी चाहिए। एक निवेशक, जो लंबी अवधि के लिए निवेश करना चाहता है, वह जोखिम भरे निवेशों पर विचार कर सकता है। जिससे उन्हें लंबे समय में अच्छे रिटर्न्स मिल सकें। एक शॉर्ट टर्म होराइजन वाले निवेशक अपेक्षाकृत स्थिर सिक्योरिटीज और एसेट क्लासेस में निवेश करने पर विचार कर सकते हैं।

म्यूचुअल फंड पोर्टफोलियो (Mutual Fund Portfolio)

ऊपर बताए गए भागों में, हमने म्यूचुअल फंड में निवेश की बढ़ती प्रवृत्ति के साथ, पोर्टफोलियो के बारे में बात की थी। आइए हम अब इस बारे में बात करते हैं कि कैसे निवेशक म्यूचुअल फंड का एक आदर्श पोर्टफोलियो बना सकते हैं, जो उसे पॉजिटिव रिजल्ट देगा। यहाँ कुछ महत्वपूर्ण कदम उसी के लिए दिए गए हैं :

1.) एक लक्ष्य के साथ ब्लूप्रिंट रखे:

शुरुआत में आपको इस बिंदु पर विचार करना होगा कि आप निवेश क्यों कर रहे हैं। इसका उत्तर सेवानिवृत्ति के लिए हो सकता है, आपके बच्चों की शिक्षा, एक घर बनाना, अपने सपनों की कार खरीदना, इत्यादि हो सकता है। जो भी लक्ष्य हो, एक खाका तैयार करना होगा, जिसमें टाइम होराइजन और रिस्क के साथ मासिक या समय-समय पर निवेश की जाने वाली राशि शामिल होनी चाहिए। यह आगे म्यूचुअल फंड के प्रकार और आवंटित की जाने वाली राशि को अंतिम रूप देने में सहायता करेगा।

ऐसा एक वित्तीय विशेषज्ञ या म्यूचुअल फंड सलाहकार की मदद से किया जा सकता है जो आपके वित्तीय लक्ष्यों और आवश्यकताओं को प्राप्त करने के लिए एक योजना तैयार करेगा।

2.) एसेट एलोकेशन तय करें:

कुछ विशेषज्ञों की राय है कि एसेट एलोकेशन का निर्धारण सबसे महत्वपूर्ण कदम है जो किसी को अपने निवेश के संबंध में करना होगा। यह संपूर्ण पोर्टफोलियो में डायवर्सिफिकेशन लाने और अपेक्षित परिणाम अर्जित करने में मदद करेगा। अब सवाल उठता है कि आखिर कैसे? उत्तर पाने के लिए व्यक्ति को अपने लक्ष्यों, उम्र, रिस्क, कैपेसिटी और अन्य महत्वपूर्ण चीजों पर फिर से गौर करना चाहिए। उदाहरण के लिए, अगर 25 वर्ष से कम आयु का कोई युवा 20 साल बाद घर खरीदने का लक्ष्य रखता है, तो वह मुख्य रूप से हाई रिस्क को सहन कर सकता है। इसके लिए वह स्मॉल और मिड कैप की तरफ जा सकता है, क्योंकि उसके पास काफी समय है।

3.) अपनी होल्डिंग और अन्य निवेशों का आकलन करें : 

एक निवेशक को अन्य सभी निवेशों को ध्यान में रखना चाहिए जो वह एक पोर्टफोलियों में रखता है। जाँच करनी चाहिए कि उसका निवेश कहीं ओवरलैप तो नहीं कर रहा है। यानी कि पूरी तरह से डायवर्सिफाइड है। उसे हिसाब लगाना चाहिए कि वह उनमें कितना निवेश करता है। इसे करने के बाद, निवेशक एक सही निर्णय लेने में सक्षम हो जाएगा, क्योंकि उसे अब पता चल जाएगा कि वह पहले से क्या निवेश कर रहा है और क्या संभावित विकल्प अभी बचे हैं। 

4.) यह सब एक साथ लाये :

अब जब एक निवेशक सभी पहलुओं के बारे में अच्छी तरह से जानता है और उसके पास एक सही ब्लूप्रिंट(खाका) है, तो उसे वित्तीय सलाहकारों और पेशेवरों से संपर्क करना चाहिए। साथ ही आवश्यक शोध करके यह देखना चाहिए कि धन का संयोजन उसके ब्लूप्रिंट के हिसाब से है। देखना होगा कि उसे अब किस तरीके से निवेश करना चाहिए,  ताकि वह एक निश्चित कार्यकाल के बाद अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सके।

Also Read: What is Portfolio

पोर्टफोलियो के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न- 

प्रश्न: पोर्टफोलियो मैनेजमेंट क्या होता है ?

उत्तर:  किसी म्यूचुअल फंड में निवेशकों द्वारा निवेशित किए गए धन को एक पोर्टफोलियो मैनेजर मैनेज करता है। साथ ही निवेशकों के विहाप पर फंड मैनेजर्स निवेशकों का पैसा विभिन्न एसेट क्लासेस में लगाते हैं। जिनके ऊपर निवेश को ग्रो करने की जिम्मेदारी होती है, लेकिन बाध्यता नहीं। 

Also Read:

श्रीराम फाइनेंस fd इंटरेस्ट रेट्स 2023

What is Nifty
Demat Account
Hedge Funds in India
Best Mid Cap Mutual Funds to Invest in India
Invest in Mutual Funds in India
What is Rupee Cost Averaging in SIP?
Growth Funds: Meaning, Risk, Returns, Benefits, Taxability